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श्रमण संस्कृति की व्यापकता

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श्रमण संस्कृति की व्यापकता

श्रमण-संस्कृति की गरिमा और महिमा युगों-युगों से बड़ी प्रभावक एवं लोकप्रिय रही है। एक पुरातत्त्ववेत्त्ता का कथन है कि ‘‘यदि हम दस मील लम्बी त्रिज्या (Radius) को लेकर भारत के किसी भी स्थान को केन्द्र बनावें, तो उसके भीतर निश्चय से ही जैन-भग्नावशेषों के दर्शन होंगे।१’’ इसीलिये गहन खोजबीन करके इतिहासकारों - डॉ. भण्डारकर, डॉ. वि.ना. पाण्डेय, डॉ. कामता प्रसाद, डॉ. ज्योति प्रसाद, डॉ. वा.दे. शरण अग्रवाल आदि ने भारत में इसकी व्यापकता पर पर्याप्त प्रकाश डाला ही है। अत: मैं यहाँ उसकी चर्चा न कर केवल विदेशों में उसकी व्यापकता पर प्रकाश डालने का प्रयत्न करूूंगा।

संस्कृति शब्द का अर्थ बड़ा व्यापक है। उसके अन्तर्गत ज्ञान-विज्ञान, मनोविज्ञान एवं लोक-जीवन के अनेक तत्वों का समावेश माना गया है। सम्बन्धित आलेख विदेशों में उपलब्ध केवल प्राकृत-भाषा, जैन साहित्य, श्रमण-जैन समाज एवं जैन-मन्दिरों की व्याप्ति-उपलब्धि तक ही सीमित रखा गया है।

पुराविदों के अनुसार ई. सन् की सहस्राब्दियों पूर्व श्रमण जैन संस्कृति तो विदेशों में व्याप्त थी ही उसकी परवर्ती परम्परा में विश्व-विजय के आकांक्षी यूनानी आक्रान्ता सिकन्दर-महान् के कल्याण नाम के जैन-मुनि के सत्संग के कारण उसका (सिकन्दर) हृदय-परिवर्तन हो गया था और अनुनय-विनय कर वह उन्हें अपने साथ सर्वोदयी श्रमण-जैन संस्कृति के प्रचार-प्रसार करने हेतु प्राच्यकालीन (पेशावर) से यूनान ले गया था। कल्याण-मुनि ने भी वहाँ तथा आसपास के प्रदेशों में पर्याप्त मात्रा में श्रमण संस्कृति का प्रचार-प्रसार और वहाँ के निवासियों को पुन: जागृत कर उन्हें अपना भक्त बना लिया था। यह परम्परा इसके बाद भी बनी रही।

तत्पश्चात् देव-शास्त्र एवं गुरु के परम आराधक महासार्थवाह कोटिभट-श्रीपाल, चारुदत्त, भविष्यदत्त, जिनेन्द्रदत्त और साहू नट्टल जैसे जैन व्यापारियों ने भी विदेशों में जाकर व्यापार किया ही, अपने साथ वे तीर्थंकर-मूर्तियाँ तथा जैन-साहित्य भी लेते गये जो वहाँ के निवासियों को भेंट में प्रदान किये। इस प्रकार उनका विदेशी-श्रमणों के साथ पूर्वागत मैत्री-भाव और भी अधिकाधिक प्रगाढ़ होता गया। इसकी चर्चा ब्रह्म. लामचीदास एवं ठाकुर बुलाकीदास (अठारहवीं सदी) ने अपने-अपने यात्रा-विवरणों में की है।

इतिहासकार डॉ. कीथ का कथन

प्राच्य भारतीय इतिहास के मर्मज्ञ डॉ. कीथ ने विदेशों में श्रमण जैन संस्कृति की लोकप्रियता और उसकी व्यापकता पर अच्छा प्रकाश डाला है। उनके अनुसार२ - ‘‘........... बेरिंग जलडमरुमध्य (Isthmus) से लेकर ग्रीनलैण्ड तक समस्त उत्तरी ध्रुवसागर के तटवर्ती क्षेत्रों में शव्यद ही ऐसा कोई स्थान बचा हो, जहाँ श्रमण-संस्कृति के अवशेष प्राप्त न होते हों।’’

डॉ. कीथ आगे पुन: कहते हैं। कि ‘‘साइबेरिया की तर्क-जातियों के गमनागमन से यह श्रमण-धर्म तुर्कीस्तान (वर्तमान टर्की) तथा मध्य-एशिया के अन्य देशों या उनके प्रदेशों में भी फैला। उसके अहिंसा, अपरिग्रह एवं विश्व-मैत्री के सिद्बान्तों ने मंगोलिया, चीन, तिब्बत और जापान को भी प्रभावित किया।’’

‘‘साइबेरिया के श्रमण-संस्कृति के रंग में रंगे हुए लोग प्रचुर-मात्रा में बेरिंग जलडमरुमध्य को पार करके उत्तरी-अमेरिक के पश्चिमी पर्वतीय-क्षेत्र के किनारे-किनारे आगे बढ़ते गये और इस प्रकार वे उत्तरी-अमेरिका में जा पहुँचे तथा उन्होंने वहाँ श्रमण-संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया।’’

‘‘आस्ट्रेलिया में ईसाई-धर्म तथा अफ्रीका में इस्लाम धर्म के प्रचार के पूर्व वहाँ के प्राचीन जातीय धर्मों पर भी श्रमणों के आत्म-ज्ञान-विज्ञान एवं जैनाचार का प्रभाव पड़ा और इस प्रकार उक्त दोनों द्वीपों में प्रभावक रूप से श्रमण-संस्कृति का प्रचार हुआ। किन्तु बाद में स्थितियाँ बदल गई।’’

इस प्रकार एशिया, अमेरिका, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और युरोप में श्रमण-संस्कृति की लोकप्रियता बढ़ी और परिवर्तित होती रही।’’

जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है - ईसा पूर्व ३२६ के नवम्बर मास के लगभग सिकन्दर- महान् ने समकालीन (अखण्ड भारत के) पंजाब के अटक के समीपस्थ तक्षशिला में पहुंचकर जब यह सुना कि यहां अनेक जिम्नोसोफिष्ट (नग्न जैन-साधु) एकान्त में रहकर कठोर तपस्या कर रहे हैं। तब जिज्ञासा-वश उसने (सिकन्दर ने) अपने अंशक्रेटर ;वदमेपातंजनेद्ध नामके एक विस्वस्त-पात्र को उन जिम्नोसोफिष्टों (नगन श्रमण जैन साधुओं) को अपने पास बुला लाने हेतु भेजा।

आज्ञाकारी उस अंशक्रेटर ने तत्कान ही जाकर उस साधु-संघ के आचार्य दोलामस (Daulamus) को सिकन्दर का आदेश सुनाया और उसे सिकन्दर के पास चलने को कहा। अंशक्रेटर ने उसे यह भी बतलाया कि भेंट होने पर सिकन्दर उसे (आचार्य दोलामस को) पारितोषिक भी देंगे। किन्तु उपस्थित न होने पर वह (सिकन्दर) उस आचार्य (दौलामस) का सिर काटकर फ़ेंक देगा।

उक्त वार्तालाप के समय आचार्य दौलामस (Daulamus) भूमि पर सूखी घास (पुआल) पर लेटे हुए थे और लेटे-लेटे ही उस (सिकन्दर-दूत) अंशक्रेटर को उन्होंने उपेक्षा भरी वाणी में इस प्रकार उत्तर दिया कि - ‘‘सर्वश्रेष्ठ राजा–ईश्वर कभी भी बलात् किसी को हानि नहीं पहुंचाता। वह सृष्टि के प्रकाश, जल, मानवीय-तन या आत्मा को भी नहीं बनाता और न ही उनका संहार करता है।’’ पुन: उन्होंने कहा –

‘‘सिकन्दर कोई देवता नहीं। क्योंकि एक न एक दिन उसे मरना ही है और वह जो पारितोषिक मुझे देना चाहता है वह भी मेरे लिए निरर्थक है। मैं तो परिग्रह-त्यागी हूँ, घास पर निश्चिन्त होकर सोता हूँ। जिस प्रकार माँ अपने बच्चे की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है, उसी प्रकार पृथिवी माता हमारे भक्तगण मेरी भी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करती रहती है। भिक्षावृत्ति में हमें भोजन मिल ही जाता है। कभी-कभी नहीं भी मिलता है, तो उससे भी मैं किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव नहीं करता। अत: सिकन्दर भले ही मेरी गरदन काट डाले किन्तु़ मेरी अजर-अमर आत्मा को नहीं काट सकता। फिर भला मुझे डर किस बात का ?

मृत्योर्विभेषिमूढ, भीतं मृत्युर्न मुञ्चति।’’

तुम जाकर उस सिकन्दर को कह दो कि दोलामस तुम्हारे पास नहीं आएगा। उसे तुम्हारी किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं और हाँ, उसे यह भी कह देना कि सिकन्दर को यदि मुझसे कुछ चाहिए हो, तो वह सर्वप्रथम मुझ जैसा (अर्थात् नग्न जैन श्रमण-मुनि) बन जाय।’’

सिकन्दर के संदेश-वाहक अंशक्रेटर ने लौटकर दोलामस का वह निर्भीक उत्तर सिकन्दर को कह सुनाया, तो वह सिकन्दर भी आश्चर्यचकित हो गया और उस वृद्ध नग्न साधु दौलामस से अपनी पराजय तत्काल स्वीकार कर ली।

उसी समय से उसके (सिकन्दर के) मन में यह भावना जागृत हो उठी कि ऐसे साधु को यूनान में ले जाकर उससे धर्म-प्रचार कराना अधिक जन-हितकारी होगा। यही निर्णय कर वह (सिकन्दर) दौलामस के साधु-संघ के एक प्रभावी नग्न-साधु कल्याण-मुनि को अपने साथ यूनान ले गया, जिसने वहाँ श्रमण-संस्कृति एवं जैनधर्म का खूब प्रचार किया।

यह ऐतिहाससिक प्रसंग इतना भावोत्तेजक एवं रोचक सिद्ध हुआ कि प्रसिद्ध इतिहासकार Mccridle3 Plutarch4 E.I. Thamos5, Major Gereral, Furlaung6 Burnior7 R.J. Srevension8 आदि ने अपने-अपने इतिहास-ग्रन्थों में इसकी विस्तार पूर्वक चर्चा की है। मेजर जनरल फर्लांग का यह कथन विशेष महत्त्व का है, जो उन्होंने अपनी दीर्घकालीन खोजों के निष्कर्ष रूप में प्रस्तुत किया है। यथा –

........... ‘‘हिमालय के पार ओक्सियाना, बैकट्रिया और कास्पियाना बहुत पहिले से ही उसी प्रकार से धार्मिक सिद्धान्तों या आचरण में उन्नति कर रहे थे, जैसे भारतीय जैन-बौद्ध के हैं। ऐतिहासिक संदर्भों से प्राय: ही ऐसा ज्ञात होता है कि ई.पू. ७वीं सदी से बहुत पहले ही २० (बीस) से अधिक साधु-तीर्थंकरों ने पूर्वीय संसार में धर्म का प्रचार किया था। हम बहुत उचित रीति से यह विश्वास कर सकते हैं कि जैनधर्म, अत्यन्त प्राचीन काल से उन साधुओं के द्वारा चीन से कास्पियाना तक उपदेशित होता था। वह धर्म ओक्सियाना और हिमालय के उत्तर तक वर्धमान-महावीर से २००० (दो हजार) वर्ष पूर्व प्रचारित हो चुका था।९

प्राप्त संदर्भों के अनुसार१० टर्की (तुर्कीस्तान) के इस्तम्बोल नगर से लगभग ६५७ कोस की दूरी पर स्थित तारातम्बोल नाम के नगर में १७वीं सदी के एक-एक विशाल जैन-मंदिर एवं जैन-उपाश्रय के अवशेष मिले हैं। यह भी पता लगा है कि वह वहाँ सहस्रों की संख्या में जैन-धर्मानुयायी निवास करते थे वहाँ उदयप्रभ सूरि नाम के जैनाचार्य अपने संघ सहित यत्र-तत्र जैनधर्म का प्रचार करते थे।

समय-समय पर वहाँ अनेक देशों के जैन-यात्री आया करते थे। सम्राट शाहजहाँ के शासनकाल में सन् १६२६ई. में मुल्तान (पंजाब, वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित) का एक जैन यात्री, जिसका नाम ठाकुर बुलाकीदास था, वहाँ की यात्रा करके लौटा था, जिसने राजस्थानी-भाषा में अपनी यात्रा के विस्तृत संस्मरण लिखे थे। उसके अनुसार ..... तिहाँ टर्की (तुर्किस्तान) में इस्तम्बोल नगर बसै छै। तिहाँ थी ५०० कोस बब्बरकोट छै। तिहॉ थी ७० कोस तारातम्बोल छै। पच्छिम-दिस समिंदर कांठी नौड़ी छै। तठे जैन-पडासाद (प्रासाद-मन्दिर), पौसधसाल (उपाश्रय), सुतपत (श्रुतपद-शास्त्र-भण्डार), अनेक मंडन माहैं प्रथाव (विस्तार) छै। श्रावक-श्राविका, साधु-साध्वी अनेक मंडन (भवन) माहैं छै। तिहॉ उदयप्रभसूरि युगप्रधान जाति (आचार्य) छै। तठै सब प्रजा-राजा जैन छै।’’

(इस यात्रा-विवरण की पाण्डुलिपि दिल्ली के रूपनगर स्थित श्वेताम्बर जैन मन्दिर के शास्त्र-भण्डार में सुरक्षित है। (पाण्डुलिपि प्रति सं.ए५४/१४, पृ.१४२)

गान्धर-देश में श्रमण-संस्कृति

वर्तमानकालीन अफागानिस्तान प्राचीनकाल में गान्धार-देश के अंतर्गत आता था। अफगानिस्तान का अपरनाम आश्वकायन भी मिलता है। यहाँ पर १७५फीट खड्गासन आदि-तीर्थंकर ऋषभदेव की मुर्ति उपलब्ध हुई है, जो पर्वत शिला पर तराशी गई थी। उसके मस्तक पर तीन छत्र भी उत्कीर्णित है। इसी मूर्ति के आसपास अन्य २३ तीर्थंकर मूर्तियाँ भी शिलांकित हैं, उनके दर्शनार्थ विशिष्ट अवसरों पर आसपास के निवासी जैन-यात्रीगण आया करते थे।

चीनी-पर्यटक ह्वेनत्सांग (६८६-७१२ई.) ने भी वहाँ की यात्रा की थी तथा वहाँ पर स्थित दस देव-मन्दिरों (जैन-मन्दिरों) तथा वहाँ विचरण करने वाले अनेक निग्र्रन्थों (जैन-मुनियों) की चर्चा की है।११

सुप्रसिद्ध इतिहासकार डाँ जी.ई.मोर के अनुसार१२ ‘‘हजरत ईसा की जन्म-शताब्दी से पूर्व ईराक, श्याम एवं फिलीस्तीन (आदि अनार्य देशों) में सोकड़ों की संख्या में श्रमण जैन-मुनि चारों ओर फैले हुए थे। पश्चिमी-एशिया, मिश्र, यूनान एवं एथियोपिया के पहाड़ों और गहन-वनों में उन दिनों में अगणित भारतीय जैन-साधु वर्तमान थे। वे साधु वस्त्रों तक का परित्याग किये हुए थे।’’

उक्त मूर- सहाब आगे लिखते हैं कि ‘‘.......... इन जैन साधुओं का प्रभाव यहूदी धर्मावलम्बियों पर विशेष रूप से पड़ा। उनके इस प्रभाव के कारण कुछ यहूदियों की एक विशेष जाति बन गई थी, जो ‘‘एसिसनी’’ - जाति के नाम से प्रसिद्ध हुई और इन्हीं एमिसनी- जाति के लोगों ने यहूदी धर्म के क्रियाकाण्डों के पालन का परित्याग कर दिया। वे नगरों या ग्रामों से दूर एकान्त जंगलों या पहाड़ों पर घास- पूâस की कुटी बनाकर उसमें अपनी साधना करने लगे थे। वे जैन-मुनियों के समान ही अहिंसा को अपना विशेष- धर्म समझते हुए मांसाहार के सर्वथा त्यागी हो गये थे। वे कठोर संयमी जीवन व्यतीत करते थे तथा निष्परिग्रही रहते हुए रोगियों एवं असहाय दुर्बलों की निस्वार्थ भाव से सेवा किया करते थे।

मिश्र-देश में ऐसे साधुओं को ‘‘थेरापूते (स्थाविर -पुत्र) कहा जाता था, जिसका अर्थ होता है स्थितप्रज्ञ मौनी- साधु।

सियाहत - नाम- ए- नासिर नामके लेखक ने लिखा है कि इस्लाम-धर्म के कलन्दरी-तबके (सम्प्रदाय) पर जैन धर्म का पर्याप्त प्रभाव पड़ा था। इन कलन्दरों की जमात (जाति) परिव्राजकों (जैन-साधुओं) की ही जमात (जाति अथवा संघ या समुदाय) थी। उक्त कलन्दरों की विशेषता यह थी कि कोई भी कलन्दर किसी एक घर में दो रात से अधिक नहीं ठहरता था। वे लोग इन पांच नियमों को कठोरता के साथ पालन करते थे - (१) अहिंसा (२) साधुता (३) शुद्धता (४) सत्यता और (५) अपरिग्रही-वृत्ति।

उनकी अहिंसक-वृत्ति के विषय में एक कथानक विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ। तद्नुसार एक बार दो कलन्द- साधु यात्रा करते हुए बगदाद (इराक) पहुँचे। उनके सम्मुख एक शुतुर्मुर्ग ने एक गृहस्वामिनी का बहुमूल्य हीरों का हार निगल लिया। इस घटना को उन कलन्दरों के अतिरिक्त अन्य किसी ने देखा नहीं था। किन्तु वे अनजान बन गये। अत: उस (हार) की गहन खोज की जाने लगी। नगर-कोतवाल को उस (हार) के गुम जाने की सूचना दी गई।उस कोतवाल को उक्त दोनों कलन्दर-साधुओं पर उस चोरी का सन्देह हो गया। उन कलन्दरों ने भी उस मूक पक्षी-शुतुर्मुर्ग की हत्या करना या कराना धर्म-विरुद्ध समझकर उस तथ्य को छिपा लिया। फलत: कोतवाल ने उन दोनों कलन्दरों पर ही संदेह व्यक्त कर उनकी भयंकर पिटाई कर उन्हें कठोर सजा दी, जिसे उन्होंने सहन करके भी उसका रहस्य-भेदन नहीं किया। अहिंसा का ऐसा आदर्श उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है।

सुप्रसिद्ध इतिहासकार पं. विश्वम्भरनाथ पाण्डे के अनुसार सालेह-अब्दुल-कुद्दूस भी एक अहिंसावादी एवं अपरिग्राही परिव्राजक जैन-मुनि था, जिसे उसके सुधारवादी क्रांतिकारी विचारों के कारण ही कट्टरपंथियों सन् ७८३ ई. में फाँसी की सजा दे दी गई थी।

श्रीलंका में श्रमण-संस्कृति

प्राचीन काल में श्रीलंका भारत का ही एक अंग रहा था। इसी कारण वह भी श्रमण-संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र रहा था। वहाँ के उत्खनन में जैन-संस्कृति के अनेक अवशेष, स्मारक तथा तीर्थंकरों की अनेक मूर्तियाँ मिली हैं। विक्रम की १४वीं सदी में जैनाचार्य जिनप्रभ-सूरि ने अपने चतुरसीति (-८४) महातीर्थ नामक कल्प में वहाँ के (१६वें तीर्थंकर) भगवान शान्तिनाथ के महातीर्थं का उल्लेख किया है। यथा -

........श्रीलंकाया, पाताला - लंकायां त्रिकूटगिरौ श्रीशान्तिनाथ:१३ .....।

इसी प्रसंग में उन्होंने क्रौंच-सद्वीप (वर्तमान समरकन्द बुखारा-नगर) तथा हंसद्वीप के जैन महातीर्थों के भी उल्लेख किये हैं। हंसद्वीप में पांचवें तीर्थंकर सुमितनाथ के चरण-बिम्बों की स्थापना की भी चर्चा की गई है।

प्रो. ए. सी. सेन ने अपने ग्रन्थ (On the Indian Sect of Jains) में लिखा है कि श्रीलंका के राजा पाण्डुकाभय (इं.पू. तीसरी सदी) ने वहाँ एक जैन-मन्दिर तथा निग्र्रन्थों (जैन-साधुओं) के लिए एक उपाश्रय (उदासीनाश्रम) का निर्माण कराया था। यथा-

The Ruling monarch pandukabhaya of cylon (Third century B.C.) builta Vihar And monastery for the Nirgranthas.

मंगोलिया में श्रमण-संस्कृति

मंगोलिया अपने चतुर्दिक फैले देशों के समान ही श्रमण-संस्कृति का प्रभावक केन्द्र था। एक जिज्ञासु भारतीय पुराविद् ने अपनी यात्रा के अनुभव मुम्बई समाचार (-गुजराती) पत्र दिनांक ०४/०८/१९३४ के अंक में इस प्रकार प्रकाशित कराए थे। ‘‘आज मंगोलिया - देश में अनेक खण्डित जैन- मूर्तियाँ और जैन मंदिरों के तोरण- द्वार भूर्गभ से निकले हैं।१४ कुछ विद्वानों ने मंगोलिया का अपरनाम मंगलावती भी बतलाया है।

ऋषभदेव एक ऐतिहासिक क्रांतिकारी नाम

विश्व के सामाजिक इतिहास का अवलोकन करने से यह आश्चर्यजनक तथ्य सम्मुख आता है कि श्रमण-संस्कृति के जनक प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (वृषभदेव, आदिनाथ, आदि-तीर्थंकर) का व्यक्तित्व एवं कृतित्व लक्ष- लक्षाब्दियों तक विश्वव्यापी रहा है। उनके नामोच्चारण में विदेशों के स्थानीय जलवायु के प्रभावों के कारण भले ही कुछ परिवर्तन आया हो, किन्तु थे वे ऋषभदेव ही।१५

मेडिटरेरियन वासियों द्वारा वे रेषेभ, रेक्षेभ, अपोलो तथा बैल (ऋषभदेव का चिन्ह) भगवान के नाम से एक आराध्य-देव के रूप में पूजित हैं। रेक्षेभ से उनका तात्पर्य नाभि (ऋषभदेव के पिता) और मरुदेवी (ऋषभदेव की माता) के पुत्र ऋषभदेव१६ ही था और -

चाल्डियन देवता- नाबू को नाभि (ऋषभदेव के पिता) तथा मुरी या मुरु ही मरुदेवी (ऋषभदेव की माता) स्वीकार किये गये हैं।१७

आरमीनिया के निवासियों के रेक्षेभ निश्चय ही आदि तीर्थंकर ऋषभदेव थे।१८

कुछ इतिहासकारों के अनुसार सीरिया का पूर्व- नाम श्री ऋषभ (सी-श्री, रिया- ऋषभ) के नाम पर रखा गया था। वर्तमान में उसके एक नगर का नाम राषाफा है, जो स्थानीय जलवायु के प्रभाव से ऋषभ का ही परिवर्तित नाम है।१९

पूर्वकालीन सोवियत-संघ के आरमेनिया में रेशावान नाम का एक नगर तथा बेविलोन का एक नगर इसवेकजूर भी ऋषभ के परिवर्तित नाम है।२०

फिनीशियनों के अतिरिक्त अकेडिया, सुमेरिया और मेसोपोटामिया के भी सिन्धु नदी के घाट- प्रदेश से सांस्कृति और व्यापारिक सम्बन्ध थे और वहाँ के व्यापारी ऋषभ के कृतित्व एवं व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उनके सर्वोदयी सिद्धान्तों को अपने-अपने देशों में प्रचारर्थ लेते गये थे।२१

तिब्बत, भूटान, नेपाल आदि में श्रमण-संस्कृति

उक्त देशों तथा पाश्र्ववर्ती क्षेत्रों में श्रमण-संस्कृति के यत्र-तत्र प्रचुर मात्रा में अवशेष मिलते हैं। उनसे स्पष्ट होता है कि पुराकाल में वहाँ प्रचुर मात्रा में जैन धर्मानुयायी निवास करते रहें और उन्होंने वहाँ जैन-मन्दिर, जैन-तीर्थ एवं तीर्थंकर-मूर्तियों के निर्माण कराए थे।

हिन्दी विश्व कोश२२ (तृतीय खण्ड, पृ. १२८) के अनुसार रूसी पर्यटक नोटोविच को तिब्बत के हिमिल-मठ में पाली (प्राकृत) भाषा की एक पाण्डुलिपि प्राप्त हुई थी, जिसमें लिखा था कि ईसा ने भारत तथा भोट (तिब्बत) देश जाकर वहाँ अज्ञातवास किया था तथा वहाँ उन्होंने जैन-साधुओं के साथ साक्षात्कार भी किया था।

उक्त पाण्डुलिपि के अनुसार भोट (तिब्बत) देश में भगवान् महावीर का विहार हुआ था तथा वहाँ के निवासी डिमरी एवं डिंगरी जाति के लोग दिगम्बर -जैन थे। डिंमरी एवं डिंगरी दिगम्बर शब्द का ही रूपान्तरित रूप है। वहाँ जैन पुरातात्त्विक-सामग्री पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होती है। पुराविदों के अनुसार नेपाल सहस्राब्दियों पूर्व से ही श्रमण- संस्कृति का गढ़ था। वहाँ (नेपाल) के राष्ट्रिय- अभिलेखागार में अनेक प्राचीन- ग्रन्थ सुरक्षित हैं, जिनमें अर्धमागधी- आगम के ‘‘प्रश्न व्याकरण सूत्र’’ (पण्हवागरण) की प्राचीन पाण्डुलिपि भी सुरक्षित है।

नेपाल की राजधानी काठमाण्डू के पास बागमती- नदी के किनारे पाटन के शंखमूल नामक स्थान से उत्खनन में लगभग १४०० चौदह सौ वर्ष प्राचीन भगवान चन्द्रप्रभ तीर्थंकर की कायोत्सर्ग- मुद्रा वाली एक मूर्ति उपलब्ध हुई है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिये वहाँ एक विशाल जैन मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है। प्राप्त सूचना के अनुसार वर्तमान में वहाँ लगभग ५०० जैन परिवार निवास कर रहे हैंं

भूटान निवासी जैन ब्रह्मचारी लामचीदास ने सन् १७७१ में अपनी कैलाश- पर्वत पद यात्रा के प्रसंग में चीन, तिब्बत, तातार, कोरिया-चीन, महाचीन, खासचीन, को-चीन तथा कुछ समुद्री- टापुओं की यात्रा की थी और वहाँ के आंखों देखे तथ्यों का संक्षिप्त वर्णन किया था। इस पद यात्रा में उन्हें २२ वर्ष लगे थे। उसका आँखों देखा रोचक वर्णन और अपने अनुभवों को उन्होंने अपनी ‘‘मेरी कैलाश यात्रा’’ नाम की पुस्तिका में ग्रथित किया है। जो वी.नि.सं. २४८६ (सन् १९५६) में मेरठ शहर से प्रकाशित हुई थी। यह यात्रा वृत्तान्त उसी प्रकार महत्वपूर्ण है, जिस प्रकार मेगास्थनीज, फाहियान, हेवेनत्संग, इत्सिंग एवं अलवेरुनी आदि विदेशी-पर्यटकों के यात्रा-वृतान्त।

ब्रह्मचारी लामचीदास ने कैलाश पर्वत के यात्रा मार्ग में पद-पद पर जैन मूर्तियों के अवस्थित रहने की चर्चा की है।

ब्र. लामचीदास के अनुसार पैकिंग नगर में तुनावारे जैनियों के ३०० जैन मन्दिर थे और उनके जैनागम चीनी- लिपि में लिखते थे।२३

उनकी याया - विवरण के कुछ रोचक एवं सूचक तथ्य निम्न प्रकार हैं :-

१. को-चीन मुलुक की सीमा पर बहावल- पहाड़ की घाटी पर कोस २५० गये। इस पहाड़ पर बाहुवली (प्रथम तीर्थंक ऋषभदेव के द्वितीय पुत्र) की प्रतिमाएँ, खड़े योग (कायोत्सर्ग) मुद्रा में बड़ी-बड़ी ऊँची जगहों पर है। (ध्यातव्य है कि जैन इतिहास के अनुसार बाहुबलि का राज्य इसी प्रदेश में था और जिसकी राजधानी तक्षशिला था)

२. को-चीन मुल्क के वीदम-देश होवी-नगर इस देश में कई नगरों में आमेढना- जाति के जैनी रहते हैं। इनकी प्रतिमाएँ सिद्ध (तीर्थंकर के निर्वाण - कल्याणक) के आकार (आकृति) की हैं।

३. चीन मुल्क के गिरगम- देश, ढांकुल नगर में यह यात्री (लामचीदास) गया। इस देश की राजधानी इसी ढांकुल -नगर में हैं। यहां के राजा एवं प्रजा सभी जैन धर्मानुयायी हैं। ये सभी लोग तीर्थंकर के अवधिज्ञान की पूजन करते हैं। इन्हीं प्रतिमाओं की मन:पर्ययज्ञान तथा केवलज्ञान की भी पूजा करते हैं।

४. चीन मुलुक के पैकिन शहर में तुनावारे (जाति के) जैनियों के शिखरवन्द ३०० जिन-मन्दिर हैं जिनमें कायोत्सर्ग एवं पद्मासनी मुद्राओं में जिनेन्द्र मूर्तियाँ हैं। इनका एक हाथ पर केश- लोंच कर रहा है (अर्थात् ये मूर्तियाँ दीक्षा-कल्याणक की हैं)।

उक्त मंदिरों में स्वर्ण के चित्र बने हुए हैं। छत्र हरे पन्ने पर मोतियों के डिब्बेदार हैं। सोने-चांदी के कल्पवृक्ष बने हैं। इन मन्दिरों में वनों की रचना है जो दीक्षा -कल्याणक के सूचक हैं।

तिब्बत- देश में शृंगार- देश के वरजंगल- नगर में लामचीदास के कथनानुसार वाघामारे जाति के ८००० जैन परिवार निवास करते हैं। उनके यहां पर तीन, पांच एवं सात गुंबज वाले २००० सुन्दर जैन मंदिर हैं। एक -एक मन्दिर पर सौ-सौ, दो-दो सौ कलश सुशोभित हैं। इन मंदिरों में ऋषभदेव की माता मरुदेवी के बिम्ब भी विराजमान हैं। इन मंदिरों में रत्नों और पुष्पों के बरसने के चिन्ह छतों में अंकित हैं।

तिब्बत के ही एरूल नगर में जैनी राजा राज्य करता है। इस नगर में मावरे जाति के जैन निवास करते हैं। यहां एक नदी के किनारे २०,००० जैन मंदिर हैं और जेठ वदी तेरस, चउदस को दूर-दूर के जैन यात्री वन्दना करने आया करते हैं। नदी के किनारे ही संगमरमर पत्थर का १५० गज ऊँचा सुन्दर मेरुपर्वत भी बना हुआ है। जिनाभिषेक, मेला-समारोह आदि के कारण यहाँ हर्ष का वातावरण सदैव बना रहता है।

तिब्बत के अन्य नगर में सोहना जाति के जैनी निवास करते हैं। यहाँ के जैनी तीर्थंकरों की राज्य-विभूति को वन्दन- नमस्कार करते हैं। मूर्तियों के सिर पर मुकुट बंधे हुए हैं।

तिब्बत की दक्षिण-दिशा में ८० कोश की दूरी पर सुन्दर वनों एवं सरोवरों से समृद्ध नगर में ब्रह्मचारी लामचीदास लगातार एक वर्ष तक रहा। यहाँ के जैनी जैन पंथी हैं। ये लोग तीर्थंकर के दीक्षा- कल्याणक के पूजक हैं।

यहाँ पर उनके १०४ शिखर बन्द सुन्दर रत्न जटित मन्दिर हैं। यहाँ वनों में भी तीस हजार जैन मन्दिर हैं इनमें नन्दीश्वर-द्वीप की आकृति के बावन (५२) चैत्यालय भी निर्मित हैं। इन्हीं कारणों से उसे वनस्थली भी कहा जाता है।

ब्रह्मचारी लामचीदास ने वहाँ के जैनागमों का श्रवण कर तथा प्रभावित होकर ग्यारह प्रतिमाएं धारण की थीं। यहाँ पर समय-समय पर जैन समारोह होते रहते हैं।

तिब्बत- चीन की सीमा की दक्षिणी सीमा हनुवर- देश में १०-१०,१५-१५ कोस पर जैन पन्थियों के अनेक नगर थे जिनमें अनेक जैन- मन्दिर थे। इस हनवुर देश का राजा एवं प्रजा सभी जैनी हैं। इस देश की कुल आबादी कई लाख में है। इस प्रदेश में जंगली जानवर अधिक हैं। अत: उनसे सुरक्षा के लिए नगर- कोट के द्वारा पर एक प्रहर दिन रहते हुए भी बन्द कर दिये जाते हैं। यहाँ से ब्र. लामचीदास वैâलाश (अष्टापद) पर्वत की पदयात्रा के लिये चल पड़े। जिसकी चर्चा पीछे की जा चुकी है।


प्रो. डाँ राजाराम जैन

अनेकान्त जुलाई -सित्म. २०१३